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Friday, December 4, 2015

रामायण : रम्या रामायणी कथा

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः |
यत् क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम् ||(वाल्मीकिरामायण ,बालकाण्ड २. १५ )

संस्कृत - साहित्य की परम्परा में महर्षि वाल्मीकि को आदि कवि कहा जाता है । वैदिक साहित्य के बाद लौकिक साहित्य का आरम्भ क्रौञ्च वध की उस घटना से माना जाता है ,जिसके अनुसार तमसा नदी के तट पर किसी निषाद (बहेलिये) ने काममोहित क्रौञ्च पक्षी के युगल में से एक पर प्राण घातक प्रहार किया था और उसके दुःख से उद्विग्न महर्षि वाल्मीकि के मुख से एक छंद फूट पड़ा था ,जो भारतीय साहित्य चेतना में इतनी गहराई से अंकित हो गया कि उस सन्दर्भ को महाकवि कालिदास से लेकर वर्त्तमान युग के साहित्यकार तक सभी निरंतर दोहराते रहे हैं ।
भारतीय साहित्य में रामकथा का व्यापक महत्त्व है । राम कथा ने न केवल लोक को तो निरंतर आलोकित किया ही गया है बल्कि एशियाई  साहित्य एवं संस्कृति के विकास में बी ऐतिहासिक भूमिका का निर्वाह किया
 है ।आदिकवि वाल्मीकि से लेकर वर्त्तमान काल तक सतत परिवर्तनशील सामाजिक परिवेश तथा जीवन और संसार के परिवर्तित होते हुए सन्दर्भ श्रीराम कथा के परिप्रेक्ष्य में नए सिरे से व्याख्यायित होते रहे हैं । विश्व साहित्य के  इतिहास में  राम कथा को जितनी लोकप्रियता प्राप्त हुई है ,वह अद्वितीय है ।
बालकाण्ड के प्रथम सर्ग का आरम्भ -
तपः स्वाध्यायनिरतं तपस्वी वाग्विदां वरम् |
नारदं परिपप्रच्छ वल्मिकिर्मुनिपुङ्गवम् ||
को न्वस्मिन् संप्रतंलोके गुणवान् कश्च वीर्यवान् |
 धर्मज्ञश्च क्रतज्ञश्च सत्यवाक्यो दृढव्रतः ||
श्लोक से हुआ  है |